विकास बनाम पर्यावरण: ‘सात मोड़’ पर उत्तराखंड के सामने बड़ा सवाल

देहरादून। ऋषिकेश-देहरादून हाईवे पर भानियावाला-जॉलीग्रांट-ऋषिकेश फोरलेन परियोजना के तहत आने वाला ‘सात मोड़’ इन दिनों विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच बहस का केंद्र बना हुआ है। एक ओर सरकार और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) इस परियोजना को सड़क सुरक्षा और बेहतर यातायात के लिए जरूरी बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पर्यावरणविद, स्थानीय युवा और सामाजिक संगठन पेड़ों के कटान और वन्यजीवों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता जता रहे हैं।

एनएचएआई के अनुसार, सात मोड़ क्षेत्र लंबे समय से दुर्घटना संभावित (ब्लैक स्पॉट) रहा है। संकरी और घुमावदार सड़क के कारण यहां अक्सर हादसे होते हैं। अधिकारियों का कहना है कि सड़क को चौड़ा और सीधा बनाने से दुर्घटनाओं में कमी आएगी, यात्रा समय घटेगा और चारधाम यात्रा तथा जॉलीग्रांट एयरपोर्ट तक आवागमन अधिक सुरक्षित और सुगम होगा। परियोजना में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए एलीफेंट अंडरपास, साउंड बैरियर और ग्रीन गाइड हेज जैसी व्यवस्थाएं भी प्रस्तावित हैं।

दूसरी ओर, पर्यावरण संरक्षण से जुड़े ओमनी बिष्ट ,शिल्पी भट्ट , आशुतोष कोठारी, अर्चना का कहना है कि इस परियोजना के तहत बड़ी संख्या में पुराने और हरे-भरे पेड़ों का कटान होगा। उनका मानना है कि यह क्षेत्र राजाजी नेशनल पार्क के बफर जोन और हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर के निकट है। ऐसे में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और मानवीय गतिविधियों में वृद्धि से मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की आशंका है। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर युवाओं का समर्थन पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में दिखाई दे रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पर्वतीय राज्य में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती है। सुरक्षित और आधुनिक सड़कें राज्य की आर्थिक प्रगति, पर्यटन और जनसुरक्षा के लिए आवश्यक हैं, लेकिन प्रदेश की पहचान उसके घने जंगल, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधन भी हैं, जिनका संरक्षण समान रूप से महत्वपूर्ण है।

अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार, तकनीकी विशेषज्ञों और आंदोलनरत युवाओं के बीच किस प्रकार का समाधान निकलता है, जिससे विकास कार्य भी आगे बढ़ें और उत्तराखंड की पर्यावरणीय विरासत भी सुरक्षित रह सके।

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